Indian Evidence Act/BSA Case Law Hindi Medium

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

भारतीय साक्ष्य अधिनियम

(Indian Evidence Act)

 

सामान्य सिद्धान्त

मामले

निर्णीत तथ्य

1.       जोधन बनाम . प्र. राज्य, 2015 (3) सी.सी. एस.सी. 1217 (एस.सी.)

उपहत साक्षी के परिसाक्ष्य का अपना स्वयं का ही महत्त्व है और उस पर विश्वास व्यक्त किया जाना है, जब तक मुख्य परस्पर विरोध एवं असंगतियों के आधार पर उसके साक्ष्य को नामंजूर करने के ठोस आधार नहीं हैं उपहत साक्षी को विधितः विशेष प्रास्थिति प्रदान की गई है और उसको हुई उपहति घटना स्थल पर उसकी उपस्थिति की अंतर्निहित प्रत्याभूति होती है।

2.       खुर्शीद अहमद बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, (2018) 7 एससीसी 429

पेश किये गए साक्ष्यों का विश्लेषण करते समय न्यायालय को एक अत्यंत तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। न्यायालय को मामूली विरोधाभासों पर साक्ष्यों को भी खारिज नहीं करना चाहिए।

3.       कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य, (2018) 6 एससीसी 433

एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करे। सच्चाई का पता लगाना न्यायालय का कर्तव्य है। साक्षी की गवाही में सच्चाई होने पर साक्ष्यों में मामूली विरोधाभासों और चूक को नजरअंदाज किया जाना चाहिए।

4.       महेन्द्रन बनाम तमिलनाडु राज्य, (2019) 5 एससीसी 67

सर्वोच्च न्यायालय ने अच्छी तरह से तय स्थिति को दोहराया कि 'एक स्थिति में झूठा, सभी स्थितियों में झूठा (falsus in uno, falsus in omnibus)' सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता है। न्यायालय ने कहा कि अगर साक्षी की गवाही कथन के हिस्से के संबंध में अविश्वसनीय है, तो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कथन के दूसरे हिस्से को आधार नहीं बनाया जा सकता है।

5.       पुष्पादेवी एम. जाटिया बनाम एम.एल. वधावन, एआईआर 1987 एससी 1748

अवांछनीय साधनों के माध्यम से प्राप्त साक्ष्य को भी विचार में रखा जा सकता है बशर्ते कि वह सुसंगत हो।

6.       अब्दुल रज्जाक बनाम स्टेट, (1969) 2 एससीसी 234

खोजी कुत्ते की मदद से तथ्यों की खोज वैज्ञानिक साक्ष्य है।

7.       कूनां बनाम उड़ीसा राज्य, (2018) 1 एससीसी 296

अभिव्यक्ति 'साबित', 'नासाबित', 'साबित नहीं हुआ' साक्ष्य के मानक के दृष्टिकोण से, अर्थात् विवेकपूर्ण मनुष्य के दृष्टिकोण से परिस्थितियों के अस्तित्व या अंनस्तित्वा के बारे में मानक को निर्धारित करता है, इतना कि, विचार को अपनाते हुए 'सबूत' को मापने के लिए एक उपयुक्त ठोस मानक के रूप में आवश्यकता, पूर्ण प्रभाव की संभाव्यता या असंभाव्यता की परिस्थितियों को दिया जाना है।

8.       म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन दिल्ली बनाम जगन नाथ अशोक कुमार, एआईआर 1987 एससी 2316

मध्यस्थों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए लेकिन वे साक्ष्यों की विधि से बाध्य नहीं होते हैं।

9.       गणेश के. गुलवे बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 2002 एससी 3068

यह जानने के लिए साक्ष्य की विवेचना की जानी चाहिए कि इसका कौन सा हिस्सा वस्तु की सही और सही स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यह अनाज को भूसे के ढेर से अलग करने (Separating grain from the Chaff) जैसा कृत्य है।

10.   आशीष बाथम बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2002) 7 एससीसी 317

सिविल मामलों में एक विषय (Matter) साबित होना तब कहां जाता है, जब संभाव्यता का संतुलन बनता है, लेकिन आपराधिक मामलों में न्यायालय को उचित संदेह से परे साक्ष्य की आवश्यकता होती है।

11.   रॉनी बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1998) 3 एससीसी 625

अन्य अपराधों के अन्वेषण में प्राप्त साक्ष्य भी किसी दूसरे मामले में अच्छे साक्ष्य का निर्माण कर सकते हैं बशर्ते वह सुसंगत हो।

12.   बैन बनाम व्हाइट रैवेन एंड फर्नेस जंक्शन, (1850) 3 एचएलसी 1

विधिक साक्ष्य विधि एक देशीय विधि (Lex Fori) है जो न्यायालयों को शासित करती है।

 

सुसंगत तथ्य

(Relevant Fact)

13.   बसंती बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, (1987) 3 एससीसी 227

न्यायालय ने कहा कि जब हत्या के तुरंत बाद, हत्या के आरोपी व्यक्ति ने मृतक की अनुपस्थिति का वर्णन यह कह कर किया कि वह गांव छोड़ चुका था, तो न्यायालय ने उस कथन को एक ही संव्यवहार के भााग के रूप में माना और इस तरह वह सुसंगत है।

14.   आर बनाम फोस्टर, (1834) 6 सी एंड पी 35

साक्षियों ने केवल तेज रफ्तार वाहन को देखा था कि दुर्घटना को। घायल व्यक्ति ने दुर्घटना की प्रकृति बताई। उन्हें इस बात का साक्ष्य देने की अनुमति दी गई कि मृतक ने क्या कहा क्योंकि यह उसी संव्यवहार (res gestae) का भाग था।

15.   जी. विजयवर्धन राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, एआईआर 1996 एससी 2971

एक ही संव्यवहार का एक भाग होने के लिए एक कथन को नैसर्गिक होना चाहिए और तथ्य के साथ समसामयिक होना चाहिए। यदि कृत्य समाप्त होने के बाद कथन कारित किया गया है और कथन देने वाले साक्षी के पास विचार या परावर्तन के लिए समय है तो यह प्रासंगिक नहीं है।

16.   गेनतेला राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (1996) 6 एससीसी 241

तथ्य जो एक ही संव्यवहार के भाग हों (Doctrine of Res Gestae) का सिद्धांत सामान्य सिद्धांत का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य (Hearsay Evidence) को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं करता हैं। धारा 6 के तहत ग्राह्य कुछ तथ्यों को स्वीकार करने का औचित्य या तथ्यों की ग्राह्यता विवाद्यक तथ्यों के संबंध में इस तरह के कथनों या तथ्यों की सहजता और स्पष्टता के कारण है।

17.   सुखर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1999) 9 एससीसी 507

धारा 6 सामान्य सिद्धान्त का एक अपवाद है कि अनुश्रुत साक्ष्य ग्राह्य नहीं है। धारा 6 के प्रावधान के भीतर अनुश्रुत साक्ष्य के प्रयोग के लिए यह स्थापित किया जाना चाहिए कि अधिनियम विवाद्यक तथ्य के साथ समसामयिक था और दोनों के मध्य कोई अंतराल नहीं होना चाहिए जो छल प्रवंचना का अवसर दे सके।

18.   राम लोचन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, एआईआर 1963 एससी 1074

मानव शरीर के कंकाल के ऊपर मिलान के लिए रखी गयी मृतक की तस्वीर यह साबित करने के लिए ग्राह्य थी कि कंकाल मृतक का था।

19.   पम्मी बनाम मध्यप्रदेश सरकार, (1998) 6 एससीसी 609;

 

जदुनाथ सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, एआईआर 1971 एससी 363

परीक्षण पहचान परेड (Holding Test Identification) आयोजित करना अनिवार्य नहीं है। इसके आयोजन में विफलता अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं है, जहां गवाह पहले से आरोपी व्यक्तियों को जान रहे थे

20.   अब्दुल वहीद खान बनाम आंध्र प्रदेश, (2002) 7 एससीसी 175

यह वांछनीय है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पहचान परेड आयोजित की जाए।

21.   हर नाथ सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 1970 एससीसी 1619

पुलिस साक्षियों को सक्षम करने के उद्देश्य से पहचान परेड आयोजित करनी होती है, जो उन संपत्तियों की पहचान करने के लिए है जो अपराध के विषय हैं या उन व्यक्तियों की पहचान करना जो इसके साथ संबंध रखते हैं। पहचान परेड के निम्नलिखित दो उद्देश्य हैं:-

1.       अन्वेषण अधिकारियों को संतुष्ट करने के लिए कि साक्षियों से पहले से अज्ञात कुछ व्यक्ति अपराध में शामिल थे।

2.       न्यायालय के समक्ष साक्षी की गवाही को पुष्ट करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करना।

22.   सुरेंद्र नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, एआईआर 1998 एससी 3031

शिनाख्त की परेड का आयोजन तब भी अनिवार्य नहीं है, जब इसकी मांग अभियुक्त द्वारा की जाए। अभियोजन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है।

23.   मलखान सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य, (2003) 5 एससीसी 746

शिनाख्त परेड एक कमजोर प्रकार का है। यह एक मौलिक साक्ष्य नहीं है। शिनाख्त परेड आयोजित करने में विफलता न्यायालय में शिनाख्त के साक्ष्यों को अग्राह्य नहीं करेगी।

24.   अमरनाथ झा बनाम नंद किशोर सिंह, (2018) 9 एससीसी 137

शिनाख्त परेड का आयोजन (TIP) करना अभियोजन के मामले के लिए स्वयं में घातक नहीं है, लेकिन यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालयों द्वारा विचारणीय होगा।

25.   सुखपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2019) 15 एससीसी 622

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के एक मामले में हेतुक स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष की अक्षमता हमेशा अभियोजन के मामले के लिए संघातिक नहीं होती है, यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया था।

26.   जयंतीभाई भेंकरभाई बनाम गुजरात राज्य, (2002) 8 एससीसी 165

अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक (Plea of alibi) धारा 11 के अंतर्गत साक्ष्य का एक नियम है। अपराध साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है और यह केवल इस तथ्य से कम नहीं किया जाएगा कि अभियुक्त ने अन्यत्र उपस्थिति के अभिवाक् लिया था। अभियुक्त द्वारा लिया गया अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् पर केवल तभी विचार करने की आवश्यकता है जब अभियोजन के भार को संतोषजनक ढंग से उन्मुक्ति दे दी गई हो।

27.   दूध नाथ पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1981) 2 एससीसी 166

अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् (plea of alibi) यह दर्शाता है कि आरोपी व्यक्ति घटना स्थल के बजाय किसी अन्य स्थान पर मौजूद था जिसका साक्ष्य उसके पास मौजूद है।

28.   दसारी सिवा प्रसाद रेड्डी बनाम पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, उच्च न्यायालय आन्ध्र प्रदेश, एआईआर 2004 एससी 4383

अभियुक्तों की ओर से अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने में विफलता अभियोजन की सहायता नहीं करता है। इस प्रकार, अन्यत्र उपस्थिति का अभिवाक् स्थापित करने के लिए अभियुक्त की ओर से विफलता इस निष्कर्ष को जन्म नहीं देगी कि अभियुक्त अपराध के स्थान पर मौजूद था।

29.   केहर सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन, एआईआर 1980 एससी 1883

धारा 10 को प्रवर्तन में लाने के लिए षडयंत्र का केवल प्रथम दृष्टया मामला स्थापित किया जाना जरूरी होता है।

30.   बद्री राय बनाम बिहार राज्य, एआईआर 1958 एससी 953

धारा 10 को अपराध की प्रकृति के कारण, षड्यंत्रकारियों के पूरे समूह के विरुद्ध सह षड्यंत्रकारियों के कृत्यों / कथनों पर लागू करने के लिए अधिनियमित किया गया है।

31.   सार्दुल सिंह बनाम बॉम्बे राज्य, एआईआर 1957 एससी 747

धारा 10 में निहत सिद्धांत 'अभिकरण का सिद्धांत (Principle of Agency) पर आधारित है। यह आपराधिक मामलों में अभिकरण के सिद्धांत को उस अवधि के भीतर षड्‌यंत्रकारियों के कृत्यों के लिए निर्धारित करता है, जिसके दौरान यह कहा जा सकता है कि कृत्य उनके सामान्य आशय के संदर्भ में थे।

32.   मिर्ज़ा अकबर बनाम बादशाह (King Emperor), एआईआर 1940 पीसी 176

धारा 10 के तहत 'सामान्य आशय' शब्द उस समय मौजूद सामान्य आशय को दर्शाता है जब कोई भी कार्य अथवा कथन उनमे से किसी एक द्वारा किया गया, किया गया या लिखा गया हो, जबकि षडयंत्र वहां सामान्य आशय की उपस्थिति में साक्ष्य के रूप में सुसंगत थी। सामान्य आशय या षडयंत्र के समाप्ति के बाद कोई कथन, वृत्तांत या संस्वीकृति, धारा 10 के तहत ग्राह्य नहीं है।

33.   सीबीआई बनाम वी.सी. शुक्ला, एआईआर 1998 एससी 1406

सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति को दूसरों के कृत्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, जब तक कि उन्हें उसके द्वारा उकसाया या उसके ज्ञान या सहमति से नहीं किया जाता है। धारा 10 इस नियम का अपवाद प्रस्तुत करता है कि एक मूलतः प्रकट कृत्य, जो किन्हीं षड्‌यंत्रकारियों में से एक द्वारा किया गया हो, अभिकरण के सिद्धांतों को लागू करने के लिए पर्याप्त है

34.   साईल सिंह बनाम बॉम्बे राज्य, एआईआर 1957 एसी 747

धारा 10 के तहत अंतर्निहित साक्ष्य 'अभिकरण का सिद्धांत' (theory of agency) है।

35.   आर.एम. मलकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य एआईआर 1973 एससी 157

टेप रिकॉर्डेड वार्तालाप ग्राह्य है बशर्ते कि वह विवाद्यक मामले से सुसंगत हो, उससे आवाज की पहचान हो एवं टेप रिकॉर्ड को मिटाने की संभावना को खत्म करके वार्तालाप की सटीकता सिद्ध की गई हो।

 

सुसंगतता/ग्राह्यता

(Relevancy & Admissibility)

36.   राम बिहारी यादव बनाम बिहार राज्य, (1994) 4 एससीसी 517

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 'सुसंगतता' और 'ग्राह्यता' शब्द समव्यापी या परस्पर विनिमय करने योग्य नहीं हैं। उनका विधिक प्रसंग अलग हैं। सभी ग्राह्य साक्ष्य आमतौर पर सुसंगत होते हैं, लेकिन सभी सुसंगत साक्ष्य ग्राह्य नहीं होते हैं

37.   गोरखपुर कलेक्टर बनाम पलकधारी सिंह (1890) आईएलआर 12 ऑल 1

जहां एक न्यायाधीश किसी विशेष साक्ष्य की ग्राह्यता के बारे में संदेह में है, उसे अग्राह्यता के बजाय ग्राह्यता के पक्ष में निर्णय करना चाहिए।

38.   साहू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, एआईआर 1966 एससी 40

साक्ष्य की ग्राह्यता और उसके पुख्ता/मुख्य होने के बीच एक अंतर है। न्यायालय को दोहरे परीक्षण को लागू करना चाहिए- पहला, क्या संस्वीकृति पूरी तरह से स्वैच्छिक थी और दूसरा, यदि ऐसा है तो क्या वाह सत्य और विश्वसनीय है।

 

प्रत्यक्ष एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य
(Direct & Circumstantial Evidence)

39.   ऋषिपाल बनाम उत्तराखंड राज्य, एआईआर 2013 एससी 3641;

 

कूना बनाम ओडिशा राज्य, (2018) 1 एससीसी 296

परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामले में हेतु महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

40.   उत्तर प्रदेश राज्य बनाम रवीन्द्र प्रकाश मित्तल, एआईआर 1992 एससी 2045;

 

गणपत सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य, (2017) 16 एससीसी 353

कभी-कभी प्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा करते हैं। वे मामले  से संबंधित परिस्थितियों से साक्ष्य प्राप्त करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विवेचना करनी चाहिए-

1.       जिन परिस्थितियों से निष्कर्ष निकाला गया है, उन्हें पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए।

2.       परिस्थितियाँ निश्चायक प्रकृति की होनी चाहिए।

3.       स्थापित किए गए सभी तथ्य केवल अपराध की परिकल्पना और निर्दोषिता के साथ सुसंगत होने के अनुरूप होना चाहिए।

4.       परिस्थितियों को एक नैतिक निश्चितता के लिए, अभियुक्त के सिवाय किसी भी व्यक्ति की संभावना को बहिष्करण करना चाहिए।

 

स्वीकृति एवं संस्वीकृति
(Admission & Confession)

41.   कौशल टोप्पा बनाम झारखंड राज्य, (2019) 13 एस.सी.सी. 676

एक न्यायिकेतर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है। संपोषक साक्ष्य के अभाव में उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। एक न्यायिकेत्तर संस्वीकृति को सह-अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य का मूल हिस्सा नहीं माना जा सकता है।

42.   दिगंबर वैष्णव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, (2019) 4 एस.सी.सी. 522

धारा 27 के तहत प्रत्येक तथ्य की खोज ग्राह्य नहीं है केवल प्रासंगिक तथ्य की खोज ग्राह्य है।

43.   दीपकभाई जगदीशचंद्र पटेल बनाम गुजरात राज्य, (2019) 16 एस.सी.सी. 547

धारा 25 घोषणा करती है कि पुलिस कार्यालय में किए गए किसी भी संस्वीकृति को किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ साबित नहीं किया जाएगा। इस तरह की संस्वीकृति अभी भी अधिनियम की धारा 21 के तहत स्वीकृति के रूप में ग्राह्य की जा सकती है, लेकिन सी आर पी सी की धारा 162 के तहत स्वीकार्यता के वर्जन के अधीन है।

44.   भारत सिंह बनाम भागीरथी, एआईआर 1966 एससी 405

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि स्वीकृति, ग्राह्य किये गए तथ्य के मौलिक साक्ष्य हैं और स्वीकृति जो विधिवत प्रमाणित हैं वह भी ग्राह्य है, चाहे उसे प्रस्तुत करने वाला पक्ष साक्षी के रूप में उपस्थित हों या हो।

45.   हनुमंत नारायण बनाम मध्यप्रदेश राज्य, 1975 एआईआर 1083 एस.सी.

स्वीकृति का उपयोग खण्डों में नहीं किया जा सकता है। यह या तो पूर्ण रूप से स्वीकार या पूर्ण रूप से अस्वीकार किया जा सकती

46.   पकला नारायण स्वामी बनाम बादशाह (Emperor), एआईआर 1939 पीसी 47;

 

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य, एआईआर 1952 एससी 354

'संस्वीकृति' (confession) शब्द लॉर्ड एटकिन द्वारा परिभाषित किया गया था। पलविंदर कौर के मामले में प्रिवी काउंसिल द्वारा दी गई परिभाषा को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया गया था। न्यायालय ने कहा कि एक संस्वीकृति को या तो अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए या फिर किसी भी दशा में उन सभी तथ्यों को जो अपराध को गठित करते हैं।' (The court held that 'a confession must either admit in terms the offience, or at any rate substantialy all the fals which constitute the offence')

47.   अब्दुल राशिद बनाम बिहार राज्य, एआईआर 2001 एससी 2422

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि बिहार और उड़ीसा आबकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत अभियुक्त द्वारा अधीक्षक को दी गयी संस्वीकृति को अनुचित एवं अग्राह्य माना गया क्योंकि आबकारी अधिकारी को धारा 25 के अर्थ के तहत पुलिस अधिकारी के रूप में माना गया था।

48.   अघ्नू नागेसिया बनाम बिहार राज्य, एआईआर 1966 एससी 119

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया कि कथन, अभियुक्त ने अपराध किया या फिर उसने कुछ जगहों पर प्रयोजन छिपाया, ग्राह्य नहीं है। केवल कथन का वही भाग ग्राह्य है जो छिपाए गए प्रयोजन के स्थान के बारे में सूचना उ‌द्घाटित करता है।

49.   मो. इनायतुल्लाह बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1976 एससी 483

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि यह साबित करना आवश्यक है कि वस्तु को छिपाने के स्थान से खोजा गया था। यदि वस्तु एक खुली जगह पर पड़ी है, तो संभावना है कि दूसरों को इसके बारे में पता चल सकता है और यह साबित करना कठिन होगा कि अभियुक्त द्वारा प्रदान की गई जानकारी के आधार पर वस्तु की खोज की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27 धारा 24 से 26 की अपवाद है।

50.   पांडुरंगा कल्लू पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2002) 2 एससीसी 490

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 27, धारा 25 और 26 की अपवाद है।

51.   उत्तर प्रदेश राज्य बनाम देवमण उपाध्याय, एआईआर 1960 एससी 1125

धारा 27 की संवैधानिक वैधता को धारित किया गया।

52.   निशिकांत झा बनाम बिहार राज्य, एआईआर 1952 एससी 1033

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संस्वीकृतकारी कथन के एक भाग पर भरोसा करने और बाकी को खारिज करने में कुछ भी गलत नहीं है। जब निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो न्यायालय सदोषकारी भाग पर विश्वास कर सकता है।

53.   प्यारे लाल बनाम राजस्थान राज्य, एआईआर 1963 एससी 1094

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि न्यायालय संतुष्ट है कि संस्वीकृति सत्य और स्वैच्छिक रूप से की गई है तो एक प्रत्याहारी संस्वीकृति (Retracted Confession) दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। विधि के मामले के रूप में, अगर न्यायालय संस्वीकृति की सत्यता और स्वैच्छिक प्रकृति के बारे में आश्वस्त हो तो सम्पुष्टि आवश्यक नहीं है; हालांकि प्रज्ञा (Prudence) की आवश्यकता होती है कि बिना पुष्टि के प्रत्याहारी संस्वीकृति के आधार पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

54.   पंजाब राज्य बनाम गुरदीप सिंह, (1999) 7 एससीसी 714

न्यायिकेत्तर संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य है और उचित मामलों में न्यायालय, इस पर भरोसा कर सकता है और अभियुक्त को दोषसिद्ध कर सकता है।

55.   कर्नाटक राज्य बनाम पी. रवि कुमार, (2018) 9 एससीसी 614

न्यायिकेत्तर संस्वीकृति एक कमजोर साक्ष्य है और यह अभियुक्त को दोषसिद्ध ठहराने का का आधार नहीं बन सकता है, जब तक कि अन्य मौलिक साक्ष्यों से समर्थन नहीं हो जाता है।

56.   आशीष जैन बनाम मकरंद सिंह, (2019) 3 एससीसी 770

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अन्वेषण अधिकारी के अनुचित दबाव और बाध्यता के तहत किए गए अनैच्छिक संस्वीकृति का कोई साक्ष्यिक मूल्य नहीं है, भले ही वह अपराध से संबंधित भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति का कारण बने।

57.   राम भरोसे शर्मा बनाम महंत राम स्वरूप, (2001) 9 एससीसी 471

एक कथन जो तथ्य और विधि के मिश्रित प्रश्न पर एक स्वीकृति की प्रकृति का है, धारा 17 के तहत एक स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता है, क्योंकि केवल तथ्यों की एक स्वीकृति स्वीकृतिकर्ता को बाध्य करती है विधि के प्रश्न के लिए की गयी स्वीकृति।

58.   सत्रुचारला विजया राम राजू बनाम निम्मका जया राजू, (2006) 1 एससीसी 212

जहाँ एक व्यक्ति स्वयं के पक्ष में कोई कथन करता है, बाद में वह उसके हितों के प्रतिकूल हो जाता है, तो यह एक स्वीकृति के रूप में उसके विरुद्ध साबित की जा सकती है।

59.   भारत सिंह बनाम भगीरथ, एआईआर 1966 एससी 405

एक स्वीकृति, स्वीकार किये गए तथ्य का एक मौलिक साक्ष्य है और विधिवत प्रमाणित एक ग्राह्य साक्ष्य है।

60.   स्टेट (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली) बनाम नवजोत सिंधु, (2005) 11 एससीसी 600

संस्वीकृति को अत्यधिक विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति खुद के विरुद्ध स्वीकृति नहीं करेगा जब तक कि वह स्वयं की अंतरात्मा द्वारा सत्य बताने के लिए प्रेरित हो।

61.   पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य, एआईआर 1952 एससी 354

संस्वीकृति या तो पूर्ण रूप से स्वीकार की जानी चाहिए या पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दी जानी चाहिए।

62.   मोहम्मद इनायतुल्लाह बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1976 एससी 483

सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 27 के संबंध में निम्नलिखित मत रखे

1.       अभियुक्त से प्राप्त जानकारी के परिणाम में तथ्य की प्राप्ति होनी चाहिए।

2.       तथ्य की प्राप्ति को अवधारित किया जाना चाहिए

3.       सूचना प्राप्त होने के समय अभियुक्त को पुलिस की अभिरक्षा में होना चाहिए।

4.       वह जानकारी जो कि तथ्य की प्राप्ति से संबंधित है केवल वही ग्राह्य है।

63.   सीबीआई बनाम वी. सी. शुक्ला, (1998) 3 एससीसी 410

स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध एक साक्ष्य नहीं है। एक स्वीकृति दूसरों के विरुद्ध साक्ष्य तभी बन सकती है यदि वह एक संस्वीकृति के रूप हो। तब इसका उपयोग सह-अभियुक्त के संस्वीकृति के रूप में धारा 10 के तहत या धारा 30 के तहत किया जा सकता है।

64.   विश्वनाथ प्रसाद बनाम द्वारका प्रसाद, एआईआर 1974 एससी 117

प्रथम कथन देने वाला पक्ष तथा वह साक्षी जिसकी परीक्षा होती है और कथन को उसके विरुद्ध प्रयोग किया जाता है, इन दोनों में अंतर है। पहले मामले में एक पक्ष द्वारा दी गई स्वीकृति अगर धारा 21 में प्रदत्त आवश्यकताओं को पूरा करती है तो वह एक मौलिक साक्ष्य के रूप में मानी जाएगी। दूसरे मामले में प्रथम कथन, साक्षी की विश्वसनीयता को खंडित करने के लिए प्रयोग किया जाता है और मौलिक साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होगी।

65.   जयसलीन बनाम तमिलनाडु राज्य, एआईआर 2009 एससी 1901

संस्वीकृति को पूर्ण रूप से स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाना चाहिए तथा न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार करने तथा निर्दोषकारी भाग को अस्वीकार करने के लिए सक्षम नहीं है। परंतु उन स्थितियों में जहां निर्दोषकारी भाग केवल स्वाभाविक रूप से अनुचित है, बल्कि यह अन्य साक्ष्यों द्वारा विरोधाभासी है। न्यायालय सदोषकारी भाग को स्वीकार कर सकता है।

66.   बाल किशन बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1981 एससी 379

एक अधिकारी पुलिस अधिकारी है या नहीं यह निर्धारित करने के लिए प्राथमिक परीक्षण यह है कि क्या संबंधित अधिकारी (विशेष अधिनियम के तहत) को अन्वेषण के लिए सभी शक्तियां प्रदान की गई हैं या नहीं, जिसमें चार्जशीट प्रस्तुत करके अभियोजन शुरू करने की शक्ति भी शामिल है।

67.   राजकुमार करवाल बनाम भारत संघ, एआईआर 1991 एससी 45

पुलिस अधिकारी की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसके पास केवल अन्वेषण की शक्ति होनी चाहिए, बल्कि आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करने की शक्ति होनी चाहिए। जब तक उसके पास आरोप का अन्वेषण करने और उसे आरोप-पत्र दाखिल करने की शक्ति नहीं है, तब तक उसे धारा 25 के अर्थों में उसे एक पुलिस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है

68.   मोहम्मद दस्तागीरी बनाम राज्य, एआईआर 1960 एससी 756

धारा 27 के तहत यह आवश्यक नहीं है कि जब कथन कारित किया गया था तब वह अभियुक्त था, उसे अभियुक्त बनाने के लिए यह पर्याप्त है कि इस तरह के कथन को न्यायालय में साबित किया जाए।

69.   हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम जीत सिंह, एआईआर 1999 एससी 1293

धारा 27 के तहत कथन केवल इसलिए अग्राह्य नहीं बन जाते हैं क्योंकि उनकी प्राप्ति किसी ऐसी जगह से की गई है जो दूसरों के लिए खुली या सुलभ है। वस्तु को उन स्थानों पर भी छुपाया जा सकता है जो दूसरों के लिए खुले और सुलभ हैं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वस्तु दूसरों को सामान्य रूप से दिखाई दे रही थी, यदि नहीं तो यह महत्त्वहीन (Immaterial) है कि वह स्थान दूसरों के लिए सुलभ था या नहीं।

70.   पुलुकुरी कोट्टाया बनाम एंपरर, एआईआर 1947 पीसी 67

'तथ्य की खोज' का अर्थ है वह स्थान जहाँ से वस्तु को प्राप्त किया गया तथा अभियुक्त का इस विषय में ज्ञान था। इस जानकारी का साक्ष्य में ग्राह्य होना अनुमन्य है। यह उस जानकारी के केवल उस हिस्से तक सीमित है, जो 'तथ्य की खोज' से संबंधित है।

71.   केहर सिंह बनाम राज्य, एआईआर 1988 एससी 1883

मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज की गई संस्वीकृति साक्ष्य में ग्राह्य होगी। यदि यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के प्रावधानों के अनुपालन में दर्ज की गई है। यदि संस्वीकृति दर्ज करने में कोई अनियमितता है, तो यह तभी ग्राह्य होगी, जब अनियमितताएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 463 के तहत सुधार करने योग्य हों।

 

मृत्युकालिक कथन

(Dying Declaration)

72.   उका राम बनाम राजस्थान राज्य, एआईआर 2001 एससी 1814

कोई भी व्यक्ति अपनी जिह्वा पर झूठ रखकर नहीं मरेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि आसन्न मरण की भावना मनुष्य के मन में वैसी बी भावना पैदा करती है जैसी शपथ से बाध्य एक पुण्य व्यक्ति के मन में होती है और उस व्यक्ति के झूठ बोलने की संभावना पूरी तरह से नहीं होती है।

73.   पाकला नारायण स्वामी बनाम एंपरर, एआईआर 1939 पीसी 47

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मृतक ने अपनी पत्नी से जो कथन किया था कि वह अभियुक्त के पास उससे पैसे लेने के लिए जा रहा था, धारा 32 (1) के तहत ग्राह्य है।

74.   कौशल राव बनाम बॉम्बे राज्य, (1958) एससीआर 552

यह तो विधि का शासन होगा और ही प्रज्ञा का, जब यह कहा जाए कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन संकता जब तक कि इसकी स्वतंत्र साक्ष्य द्वारा संपुष्टि की जाए। एक सत्य और स्वैच्छिक कथन के लिए किसी संपुष्टि की आवश्यकता नहीं है।

75.   संपत बब्सो काले बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019)4 एससीसी 739

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि हालांकि दोषसिद्धि पूरी तरह से मृत्युकालिक कथन पर आधारित हो सकती है, लेकिन उस स्थिति में जब यह संदेह हो कि पीड़ित अच्छी मनोस्थिति में था या नहीं, पुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है।

76.   क्वीन एंप्रेस बनाम अब्दुल्लाह, (1885) 7 11 385 एफबी

यह अभिनिर्धारित किया गया कि संकेतों और सर हिला के दिया गया मृत्युकालिक कथन भी सुसंगत है।

77.   सुरेश चन्द्र जेना बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, (2017)16 एससीसी 466

ऐसा कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता है जब तक कि पुष्टि की आवश्यकता बताने वाला नियम केवल विवेक संगत (Prudance) नियम है।

78.   भद्रगिरि वेंकट रवि बनाम पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, 2013
(4)
सुप्रीम 450

यदि मृत्युकालिक कथन स्वैच्छिक, विश्वसनीय और अच्छी मानसिक स्थिति में किया जाया है, तो इस पर बिना किस किया जा सकता है। किसी भी विसंगति की स्थिति में, इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं होगा।

79.   संजय बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2007)9 एससीसी 148

यदि दो मृत्युकालिक कथनों में स्पष्ट विसंगतियां हैं, तो अभियुक्त को दोषी ठहराना असुरक्षित होगा।

80.   के. रामचंद रेड्डी बनाम पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, (1976)3 एससीसी 104

जब घायल व्यक्ति पहले प्राथमिकी दर्ज कराता है उसके बाद उसकी मृत्यु हो जाती है तो प्राथमिकी को मृत्युकालिक सुसंगत माना जाएगा।

81.   कौशल राव बनाम बॉम्बे राज्य, एआईआर 1958 एससी 22

विधि का यह कोई पूर्ण नियम नहीं है कि मृत्युकालिक कथन दोषसिद्धि (conviction) साक्षी का एकमात्र आधार है जब तक कि उसकी संपुष्टि कर ली जाए। यह किसी भी अन्य साक्ष्य की तुलना में एक कमजोर प्रकार का साथ किसी भी अन्य साक्ष्य के रूप में उसी पायदान पर खड़ा है जिसपर अन्य साक्ष्य हैं।

82.   कुसा बनाम ओडिशा राज्य, एआईआर 1980 एससी 559

जब एक मृत्युकालिक कथन को सत्य तथा संगत माना जाता है तब दोषसिद्धि करने के लिए इस पर भरोसा किया जा ही इसकी कोई संपुष्टि हो।

83.   लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019)11 एससीसी 512

मृत्युकालिक कथन मौखिक या लिखित और संचार के किसी भी पर्याप्त तरीके से हो सकता है, यह शब्दों द्वारा या अन्य से पर्याप्त होगा, बशर्ते कि संकेत निश्चित और सकारात्मक हों।

 

विशेषज्ञ साक्ष्य

(Expert Evidence)

84.   बालकृष्ण दास अग्रवाल बनाम राधा देवी एवं अन्य, एआईआर 1989 एएलएल 133

एक विशेषज्ञ ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने प्रशिक्षण और अनुभव से राय व्यक्त करने की ऐसी क्षमता हासिल कर ली है जो साक्षी के पास नहीं है। किसी विशेषज्ञ के साक्ष्य ऐसे साक्ष्य होते हैं जो विशेषज्ञता और अनुभव पर आधारित होते हैं।

85.   अब्दुल रहमान बनाम मैसूर राज्य, (1972) जीएलजे 407

सोने की शुद्धता के प्रश्न में एक पेशेवर सुनार की राय को एक विशेषज्ञ की राय के रूप में प्रासंगिक माना गया, हाट पास कोई औपचारिक योग्यता नहीं थी। उसकी एकमात्र योग्यता अनुभव था।

86.   एस. गोपाला रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, एआईआर 1996 एससी 2184

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक विशेषज्ञ का साक्ष्य कमजोर प्रकार का साक्ष्य है। न्यायालय इसे निश्चायक हैं और इसलिए, स्वतंत्र और विश्वसनीय संपुष्टि के बिना इस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है।

87.   दर्शन सिंह बनाम हरियाणा राज्य, एआईआर 1997 एससी 364

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जहां चश्मदीद गवाह (प्रत्यक्ष साक्षी) एवं चोट कैसे लगी के बीच असंगतता है, तब चिकित्सक के साक्ष्य प्रत्यक्ष साक्षी साक्ष्य को निःसंदेह अधिभावी (override) नहीं कर सकता है।

88.   फखरुद्दीन बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 1967 एससी 1326

यह अभिनिर्धारित किया गया कि हस्तलेख ऐसे साक्षी के साक्ष्य से साबित हो सकती है जिसकी उपस्थिति में लेखन किया गया था और यह प्रत्यक्ष साक्ष्य होगा और यदि यह उपलब्ध है तो किसी अन्य प्रकार के साक्ष्य को अनावश्यक माना जाएगा।

89.   लतेश बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2018)3 एससीसी 66

मौखिक साक्ष्य चिकित्सकीय साक्ष्य पर प्रधानता (Precedence) रखते हैं. जब तक कि चिकित्सकीय साक्ष्य ऐसी घटना की किसी भी संभावना का पूरी तरह से खंडन नहीं करता।

90.   आशीष जैन बनाम मकरंद सिंह, (2019)3 एससीसी 770

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल एक मैजिस्ट्रेट के आदेश की अनुपस्थित होने के कारण जो कि पुलिस को अभियुक्त की अंगुलिचिह्न प्राप्त करने के लिए अधिकृत करे, यह नहीं माना जा सकता कि अंगुलिचिह्न साक्ष्य अवैध रूप से प्राप्त किया गया था।

91.   हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम जय लाल एवं अन्य, (1999)7 एससीसी 280

एक साक्षी के साक्ष्य को एक विशेषज्ञ के रूप में लाने के लिए यह दिखाना होगा कि उसने विषय का एक विशेष अध्ययन किया है या एक विशेष अनुभव प्राप्त किया है या दूसरे शब्दों में, वह कुशल है और उसे विषय का पर्याप्त ज्ञान है।

92.   मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 1980 एससी 531

विधि या प्रज्ञा (Prudence) का कोई ऐसा नियम नहीं है जो कहता है कि विशेषज्ञ की राय पर तंब तक कभी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए जब तक कि उसकी संपुष्टि हो। उपयुक्त मामलों में संपुष्टि की मांग की जानी चाहिए।

93.   विलायत खान बनाम राज्य, एआईआर 1962 एससी 122

विशेषज्ञ की राय पर तब विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, जब वह प्रत्यक्ष साक्ष्य के विरोधाभास में हो।

94.   मुशीर खान बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 2010 एससी 762

अंगुलिचिह्न विशेषज्ञ का साक्ष्य कोई मौलिक साक्ष्य नहीं हैं। इसका उपयोग केवल अभिलिखत मौलिक साक्ष्यों की कुछ वस्तुओं की संपुष्टि करने के गए किया जा सकता है।

 

दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य
(Documentary & Oral Evidence)

95.   पी गोपालकृष्णन उर्फ दिलीप बनाम केरल राज्य एवं अन्य, 2019 सर्वोच्च न्यायालय (एससी) 1306

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक अपराध के संबंध में एक मेमोरी कार्ड की सामग्री एक 'दस्तावेज' है कि कोई 'भौतिक वस्तु'

96.   महाराष्ट्र राज्य बनाम प्रफुल्ल बी. देसाई, (2003)4 एससीसी 601

साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग शामिल होगी।

97.   रूप कुमार बनाम मोहन थडानी, (2003)6 एससीसी 595

धारा 91 और 92 लिखित अभिलेखों के मामले में एकीकरण के न्यायिक कार्य की मान्यता पर आधारित (Section 91 and 92 are based on recognibion of the jural act of integration in case of written in struments) हैं और एक संविदा स्थापित करने की मांग करने वाले तीसरे पक्ष पर भी लागू होते हैं।

नोट : साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 एवं 92 "लिखत को लिखत के द्वारा ही साबित किया जा सकता है" की अवधारणा पर आधारित है।

98.   आर. जानकीरमन बनाम राज्य, (2006)1 एससीसी 697

धारा 92 तब लागू होती है जब किसी मामले में लिखत के पक्षकार अपनी शर्तों का नासाबित करना चाहता है। यह तब लागू नहीं होता है जब कोई व्यक्ति, जिसमें लिखत मामले के पक्षकार सम्मिलित हैं, यह स्थापित करना चाहता है कि मामला स्वयं दिखावटी एवं काल्पनिक है।

 

उपधारणा एवं साक्ष्य का भार
(Presumption & Burden of Proof)

99.   आंध्र प्रदेश राज्य बनाम वासुदेव राव, (2004)9 एससीसी 319

उपधारणा दूसरे ज्ञात या साबित तथ्यों से निगमित तथ्यों का अनुमान हो (A presumption is an inference of fact drawn from other known or roved facts) इसका तात्पर्य यह है, कि यह एक विधि का नियम है कि न्यायालय और न्यायाधीश एक विशेष तथ्य से एक विशेष निष्कर्ष निकालेंगे।

100.  सेठू बनाम पलानी, (1926)50 एमएलजे 453

धारा 112 के तहत उपधारणा समान बल के साथ लागू होती है, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां बच्चा शादी के कुछ दिनों के भीतर पैदा हो गया हो।

नोट : धारा-112 - विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है : यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का जन्म उसकी माता और किसी पुरुष के बीच विधिमान्य विवाह के कायम रहते हुए, या उसका विघटन होने के उपरांत माता के अविवाहित रहते हुए दो सो अस्सी दिन के भीतर हुआ था, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वह उस पुरुष का धर्मज पुत्र है, जब तक कि यह दर्शित किया जा सके कि विवाह के पक्षकारों की परस्पर पहुंच ऐसे किसी समय नहीं थी जब उसका गर्भाधान किया जा सकता था।

101.  गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, एआईआर 1993 एससी 2295

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत उपधारणा को खंडित करने का एकमात्र तरीका परस्पर पहुंच के अभाव को साबित करना है तथा बायोमेडिकल साक्ष्य जैसे रक्त परीक्षण, डीएनए परीक्षण आदि को साबित करने की अनुमति नहीं है।

102.  श्रीमती कांति देवी बनाम पोशी राम, एआईआर 2001 एससी 2226

यह अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा 112 के तहत एक बार धर्मजता का निश्चायक सबूत प्रस्तुत कर दिया जाए, उसके बाद वास्तविक डीएनए परीक्षण द्वारा भी उसका खंडन नहीं किया जा सकता है। यदि गर्भधारण के समय में पति-पत्नी एक साथ रह रहे थे, लेकिन डीएनए परीक्षणों से पता चलता है कि बच्चा पति से पैदा नहीं हुआ था, तो विधि की निश्चायकता अखण्डनीय होगी।

103.  नंदलाल वासुदेव बडबाईक बनाम लता नंदलाल बडवाईक (2014) 4 एससीसी (क्रि.) 65

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 112 के तहत निश्चायक सबूत को सामान्य रूप से किसी भी अन्य तथ्य से खंडित नहीं किया जा सकता है। हालांकि डीएनए परीक्षण एक विशुद्ध विज्ञान है और एक बार डीएनए परीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध होने के बाद, धारा 112 की उपधारणा को फिर से विखंडित किया जा सकता है।

104.  रबीन्द्र कुमार डे बनाम ओडिशा राज्य, (1976)4 एससीसी 233

साक्ष्य अधिनियम इस पर विचार नहीं करता है कि अभियुक्त अभियोजन पक्ष की तरह अपने मामले को उसी सख्ती के साथ साबित करे। यह पर्याप्त है कि वह संभावनाओं के प्रसार के मानक (preponderance of probabilities) द्वारा धारा 105 के तहत अपने मामले को साबित करे।

105.  संजय दत्त बनाम राज्य, (1994) 5 एससीसी 410

जब वैधानिक प्रावधान द्वारा निर्दोषिता की उपधारणा उलट जाती है. तो साक्ष्य का भार उतना वजनी नहीं होना चाहिए जितना अभियोजन पक्ष के लिए होता है।

106.  पी. नरसिम्हा राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, एआईआर 2001 एससी 318

साक्ष्य अधिनियम की धारा अथ प्रथायालय को उसमें निर्दिष्ट तरीके से कुछ तथ्यों के अस्तित्व को उपधारित करने के लिए पूर्ण विवेकाधिकार प्रदान करती है। वास्तव में अस्तित्व का अवधारण करते समय न्यायालय को बौद्धिक तर्क की प्रक्रिया को लागू करने की आवश्यकता होती है जैसा की एक प्रज्ञाशील (prudent) व्यक्ति समान परिस्थितियों में करेगा।

107.  नवनीथाकृष्णन बनाम राज्य, (2018) 16 एससीसी 161

यह एक अवधारित विधिक स्थिति है जो विधिक अवधारणा है कि वह व्यक्ति, जिसे अंतिम बार मृतक के साथ देखा गया था, उसने ही मृतक को मार दिया होगा। यह साबित करने के लिए कि अभियुक्त ने अपराध नहीं किया है, साबित करने का भार अभियुक्त पर है। हालांकि, इस तरह के साक्ष्य अकेले उचित संदेह से परे अभियुक्तों के अपराध को सिद्ध करने के भार का निर्वहन नहीं कर सकते हैं और इनकी संपुष्टि की जानी चाहिए।

 

विशेषाधिकृत संसूचना
(Privileged Communications)

108.  कुलविंदर सिंह एवं एक अन्य बनाम पंजाब राज्य, 2015 (3) सी.सी., एस.सी. 1440 (एस.सी.)

जब शासकीय साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय और विश्वास करने योग्य है, तब उनके साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि आधारित करने का कोई कारण ही नहीं।

109.  भारत संघ बनाम ओरिएंट इंजीनियरिंग एंड कमर्शियल कंपनी, (1978)1 एससीसी 10

धारा 121 के अंतर्गत विशेषाधिकार एक मध्यस्थ के लिए भी उपलब्ध हैं।

110.  राम भरोसे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, एआईआर 1954 एससी 704

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 122 के अंतर्गत संसूचना के अलावा पति या पत्नी के आचरण के कार्य संरक्षित नहीं हैं। एक पत्नी इस बात की साक्ष्य दे सकती है, कि उसके पति ने किसी निश्चित अवसर पर क्या किया, हालाँकि वह यही नहीं बता सकती कि उस अवसर पर उसने क्या कहा।

111.  क्वीन इंपरेस बनाम डोनोघ, आईएलआर (1899)22 मेंड 1

प्रश्न यह था कि क्या घर की तलाशी के दौरान पुलिस द्वारा बरामद अपनी पत्नी को आरोपी द्वारा भेजी गयी एक संसूचना ग्राह्य है? यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि मामले में पत्नी का परीक्षा नहीं की जा रही थी और तो इसका खुलासा करने के लिए उसे विवश किया गया था और ही ऐसा करने की अनुमति दी गई थी।

112.  एम. सी. वर्गीज बनाम टी. जे. पोन्नन, एआईआर 1970 एससी 1876

यह माना जाता था कि धारा 122 के तहत निषेध केवल पति-पत्नी पर लागू होती है, कि तीसरे व्यक्ति पर। इसके अलावा धारा 122 के तहत निषेध शादी के विघटन के बाद भी जारी रहेगी (Further the bar under Section 122 would even continue after dissalution of marriage) साक्ष्य देने के समय की स्थिति के बजाय संसूचना के समय की स्थिति को देखा जाना चाहिए।

113.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण, एआईआर 1975 एससी 865

धारा 123 लोक-कल्याण सर्वोपरि विधि है (Salus populi est suprema lex) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि लोक कल्याण सर्वोच्च विधि है। धारा 123 के संबंध में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विधि की नीव सार्वजनिक हित पर आधारित है। सार्वजनिक हित जो कि साक्ष्य की माँग करता है उसे जनहित के विरुद्ध तौला जाना चाहिए।

 

गवाह/साक्षी

(Witnesses)

114.  मोहम्मद सुगल बनाम किंग, एआईआर 1946 पीसी 3

यह अभिनिर्धारित किया गया कि एक बच्चा भी एक सक्षम साक्षी है, अगर वह उससे पूछे गए प्रश्न को समझ सकता है और तर्कसंगत उत्तर दे सकता है, भले ही वह शपथ का अर्थ अथवा इसकी मंशा समझता हो।

115.  भगवान सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 2003 एससी 1088

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि बच्चे के साक्ष्य का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है क्योंकि वह यातना का एक आसान शिकार है। इसलिए, न्यायालय हमेशा अन्य साक्ष्यों से उसके साक्ष्य की पर्याप्त संपुष्टि की तलाश करती है।

116.  रतन सिंह दलसुख भाई नायक बनाम गुजरात राज्य, (2004)1 एससीसी 64

कम आयु के बच्चे को साक्ष्य देने की अनुमति दी जा सकती है अगर उसके पास प्रश्नों को समझने और उसका तर्कसंगत उत्तर देने की बौद्धिक क्षमता है।

117.  कृष्ण पिल्लई बनाम केरल राज्य, एआईआर 1981 एससी 1237

एक हितबद्ध साक्षी के साक्ष्य को सावधानी से जांचना चाहिए। हालाँकि, जहाँ इस तरह की जाँच विश्वसनीयता स्थापित करती है, वहां ऐसे साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

118.  दगडू बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1997 एससी 1579

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 133 और धारा 114 के दृष्टांत () के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। दृष्टांत 'हो सकता है' (May) शब्द का उपयोग करता है, इसलिए विवेकाधिकार न्यायालय के पास है। न्यायालय को यह देखने के लिए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करना होगा कि क्या सहअपराधी विश्वसनीय है या नहीं।

119.  रबिंदर कुमार डे बनाम ओडिशा राज्य, एआईआर 1977 एससी 170

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी सहअपराधी के पूरे साक्ष्य को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और ही ऐसे साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय साक्षी माना जा सकता है। न्यायालय साक्ष्य के उस भाग पर भरोसा कर सकती है जो विश्वास प्रेरित करे।

120.  आर. बनाम स्करविल्ले, (1916)2 के. बी. 658

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि यह आवश्यक नहीं है कि सहअपराधी संबंधित अपराध के हर विवरण स्वतंत्र संपुष्टि हो। - पर्याप्त है कि मामले की सारवान परिस्थितियों की संपुष्टि हो।

121.  सुखवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य, एआईआर 1995 एससी 1601

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि साक्षी को तब तक प्रति-परीक्षा नहीं जा सकती है, जब तक कि पहले उसकी मुख्य जांच जाए। जहां अभियोजन पक्ष ने अपने साक्षी की परीक्षा नहीं की और उसने प्रति-परीक्षा की, वहां यह अभिनिर्धारित किया गय अभियोजन ने स्वयं अपने साक्षी को छोड़ दिया। इस तरह का दृष्टिकोण अभियोजन पक्ष के मामले की विश्वसनीयता की को प्रभावित करता है।

122.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम रमेश पाल, (1996) 10 एससीसी 306

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य सूक्ष्म परीक्षण मांग की आवश्यकता होती है क्योंकि वह खुद का ही खंडन कर रहा है, और उसके कथन का वह हिस्सा, जो अभियोजन या बचाव पक्ष के अनुरूप है, उसको स्वीकृत किया जा सकता है।

123.  गणपति बनाम तमिलनाडू राज्य, (2018)5 एससीसी 549

किसी साक्षी को 'हितबद्ध साक्षी' तभी कहा जा सकता है, जब वह मुकदमे के परिणाम से कुछ लाभ प्राप्त करता है। इसलिए, 'संबंधित साक्षी' तथा 'हितबद्ध साक्षी' एक समान नहीं है।

124.  विद्याधर बनाम मगिक राव, एआईआर 1999 एससी 1441

जब वाद करने वाला पक्ष साक्ष्य नहीं देता है और स्वयं को परीक्षा के लिए प्रस्तुत नहीं करता है, तो यह उपधारित किया जाएगा कि उसके द्वारा स्थापित मामला सही नहीं है।

125.  चाको बनाम केरल राज्य, (2004) 12 एससीसी 269

एक विश्वसनीय साक्षी बड़ी संख्या में महत्त्वहीन साक्षियों के गवाही की प्रासंगिकता को कम कर सकता है।

126.  जुवार सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, एआईआर 1981 एससी 373

यदि साक्षी का मौखिक साक्ष्य प्रथम दृष्टया अस्वीकार्य है, तो न्यायालय इसे केवल इसलिए स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि कोई प्रतिपरीक्षा नहीं हुई।

127.  गोपाल सरवन बनाम सत्य नारायण, एआईआर 1989 एससी 1141

यदि साक्षी की मुख्य परीक्षा के बाद वह प्रति-परीक्षा के अधीन किए जाने के लिए उपस्थित नहीं होता, तो उसका साक्ष्य मूल्यविहीन हो जाता है।

128.  लीला श्रीनिवास राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, एआईआर 2004 एससी 1720

यह तथ्य कि कुछ साक्षियों को पक्षद्रोही घोषित किया गया है का परिणाम उनके साक्ष्य के स्वतः अस्वीकृति के रूप में नहीं होगा। पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य भी अगर अन्य साक्ष्यों से समर्थन पाते हैं तो इस पर ध्यान दिया जा सकता है।

129.  रामचंदर बनाम हरियाणा राज्य, एआईआर 1981 एससी 1036

न्याय के प्रत्येक द्वार का पता लगाना पीठासीन न्यायाधीश का कर्तव्य है। उस उद्देश्य के लिए, उसे स्पष्ट रूप से धारा 165 के साथ साक्षियों से प्रश्न करने के अधिकार अभिव्यक्त रूप से निहित किया जाता है। यह अधिकार इतना व्यापक है कि वह किसी भी समय, किसी भी रूप में, किसी भी तथ्य जो चाहे सुसंगत हो अथवा असंगत, उसके बारे में प्रश्न पूछ सकता है।

 

विविध

(Misslenous)

130.  राजा उर्फ अय्यप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य, दाण्डिक अपील सं. 1120 वर्ष 2010, (1 अप्रैल, 2020 को विनिश्चित)

यदि किसी कारण से संयुक्त विचारण नहीं किया जाता है, तो सहअभियुक्त की संस्वीकृति का किसी अन्य अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य में ग्राह्य होना नहीं माना जा सकता है, जो उसी वाद में समय के पश्चातवर्ती बिंदु पर विचारण का सामना करेगा।

131.  आर. जयपाल बनाम तमिलनाडु राज्य, (2019) 8 एस.सी.सी. 342

यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनाज को फूस से अलग कर दे। जहां फूस को अनाज से अलग किया जा सकता है वहां अदालत के लिए खुला होगा कि वह अभियुक्त को दोषी ठहरा सकता है। हालांकि यदि अनाज और भूसे को अलग नहीं किया जा सकता है तो अभियोजन कथन को पूर्णतः खारिज कर दिया जाना चाहिए।

132.  रतन सिंह बनाम निर्मल गिल (सिविल अपील संख्या 3681-3682 ऑफ 2020)

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया है कि यदि एक दस्तावेज पंजीकृत किया गया है तो एक दस्तावेज वास्तविक माना जाता है और अन्यथा साबित करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर है जिसने कथित पंजीकृत दस्तावेज को चुनौती दी है।

133.  अर्जुन पंडितराव खोटकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंतयाल और अन्य, (सिविल अपील संख्या : 20825-20826 ऑफ 2017)

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के माध्यम से साक्ष्य की पूर्ववर्ती ग्राह्यता के लिए एक शर्त है। जहाँ संबंधित व्यक्ति या प्राधिकारी से अपेक्षित प्रमाणपत्र आवेदन किया गया हो और व्यक्ति या प्राधिकरण या तो ऐसे प्रमाणपत्र देने से इंकार करता है या ऐसी मांग का उत्तर नहीं देता है, तो ऐसा प्रमाणपत्र मांगने वाला पक्ष साक्ष्य अधिनियम, सी पी सी या सी आर पी सी के प्रावधानों के तहत अपने उत्पादन के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकता है। न्यायालय ने यह भी धारित किया कि यदि स्वयं मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है तो धारा 65 बी (4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र अनावश्यक है |

उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीश पीठ ने शाफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर के बीत मतभेद को ध्यान में रखते हुए प्रश्न का उल्लेख किया था। वह पक्ष जो डिवाइस के कब्जे में नहीं है, जिसमें से इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज का उत्पादन होता है, साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी (4) के तहत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं हो सकती है। अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर में यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 65 बी के तहत आवश्यकताओं की पूर्ति होने तक द्वितीयक साक्ष्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
पीठ ने शाफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य में निर्णय को खारिज कर दिया था।

 

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